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मंगलवार, 22 सितंबर 2015
देहरादून बुद्ध मंदिर
जीवन की आपाधापी में हम अपने संकार,गंगा,जमुनी संस्कृति भाईचारे एवं भारतीयता के मूल गुणों को लगता है भूलते जा रहे हैं.समझ में नहीं आता की आने वाले भारत को क्लैसे नागरिक मिलेंगे?हमारा निवेदन ही नहीं आग्रह भी है अपनी आने वाली पीढ़ी को अपने मूल सस्कारों से अवश्य परिचित कराएँ .पश्चिमी सभ्यता में हम अपने गुलाम मानसिकता से इतने ना डूब जाएँ की हम अपनी जड़ों को ही विस्मृत कर बैठें ?आने वाला भारत वैसा ही होगा जैसा बीज आजकल बोया जा रहा है.......सोचिये ज़रा ?
रविवार, 14 सितंबर 2014
हिंदी दिवस की यह कैसी औपचारिकता
समझ
में नहीं आता कि हिंदी दिवस हिंदी भाषी राज्यों में मनाने की जरुरत क्यों पड़ गयी
है ? इसलिए कि हिंदी अब हिंदी भाषी क्षेत्रों में इतनी बेगानी हो गयी है उसे अपनी
याद दिलाने के लिए ऐसा दिन चुनना पड़ रहा है जैसे हम लोग साल भर में एक दिन अपना जन्मदिन मनाते हैं . क्या कहीं दुनिया में इंग्लिश डे,रूसी दिवस,चीनी दिवस भी मनाया जाता है? अगर एक दिन हिंदी के लिए है तो बाकि दिन किसके लिए? ये भी तो साफ़ होना चाहिए.
हिंदी
भाषी क्षेत्रों में जब ये हाल हिंदी का हो रहा है तो गैर हिंदी भाषी क्षेत्रों में
हिंदी की स्थिति का आप सहज ही अनुमान लगा सकते हैं. पिछले वर्ष प्रधानमंत्री मोदी
ने पीएम कार्यालय से पत्र व्यवहार हिंदी भाषा में ही करने के लिए सभी राज्यों को
पत्र लिखा था. आजादी के ६५ साल बाद हिंदी राष्ट्रभाषा होने के बावजूद भी गैर हिंदी
राज्यों ने पीएम कार्यालय के इस पत्र पर हंगामा खडा कर दिया था. सभी सेकुलर
मानसिकता वाली जमात औए सेकुलर मिडिया इसके विरोध में खड़ी हो गयी. आप समझ सकते हैं
कि हिन्दुस्तान में हिंदी की स्थिति अभी सम्मानजनक नहीं है. हिंदी दिवस मनाना केवल
एक औपचारिक कार्यक्रम बन कर रह गया है. हिंदी को हम आप ही मिलकर आगे बढ़ा सकते हैं
अपने जीवन में हिंदी को पूर्णतया आत्मसात करके.रविवार, 4 मई 2014
दागियों को संसद से हटाते क्यों नहीं
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| सुनील अनुरागी |
इरादा क्या है हमें बताते क्यों नहीं ?
कब तक लुटेरे बनकर लूटते रहोगे
बेशर्मी की हद है लजाते क्यों नहीं ?
मुखौटे पीएम से देश कब तक चलेगा
असली शासक कौन है बताते क्यों नहीं ?
घोटालों का सरदार कहाँ छुपा है
सामने जनता के उसे लाते क्यों नहीं ?
अब नये मसीहा ने दुनिया को हिला दिया
सर आँखों पर उसे बिठाते क्यों नहीं ?
शुक्रवार, 16 अगस्त 2013
कथाकार रामप्रसाद विद्यार्थी ‘रावी’
कथाकार रामप्रसाद विद्यार्थी ‘रावी’-बहुमुखी,बहुआयामी
प्रतिभा
के धनी एक महान साहित्यकार
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| रामप्रसाद विद्यार्थी 'रावी' |
हिंदी साहित्य जगत को अपनी मौलिक
कृतियों से समृद्ध करने वाले प्रयोगधर्मी
जीवनशिल्पी साहित्यकार एवं चिन्तक रामप्रसाद विद्यार्थी अर्थात ‘रावी’ के निधन को
इस सितम्बर 2025 को 31 वर्ष पुरे होने जा रहे हैं. ठीक इकत्तीस साल पहले 9
सितम्बर 1994 को रावी ने आगरा (सिकंदरा) के निकट अपनी कर्मस्थली (नयानगर,कैलास
आश्रम) में भौतिक देह का परित्याग कर सूक्ष्मलोक में प्रवेश कर लिया था.
मानवीय दर्शन एवं मानवीय संबंधों की
जन्मजन्मान्तर व्यापी अखंडता के पक्षधर
रावी प्रयोगधर्मी साहित्यकार होने के साथ-साथ बहुमुखी प्रतिभा के भी धनी थे,
मानवीय जीवन और मानवीय सौन्दर्य के घोर
उपासक होने के कारण रावी मानव में अन्तर्निहित सौन्दर्य के कुशल पारखी एवं उद्घाटक
भी थे. रावी का सम्पूर्ण जीवन और साहित्य मानवीय चेतना के उन्नयन एवं विकास को
समर्पित था.
रावी केवल साहित्यकार ही नहीं थे
अपितु साहित्यकार से कहीं अधिक ऊँचे और भी बहुत कुछ उनमें निहित था. अगर हम केवल
उन्हें साहित्यकार,चिन्तक मानकर चलें तो यह रावी के सम्पूर्ण व्यक्तित्व का दशमांश
भी नहीं होगा. रावी एक महान जीवनशिल्पी भी थे. समाज का नवीन सर्जन करने वाले,सामाजिक
नवनिर्माण हेतु नए मानव की रचना को समर्पित इस महान जीवनशिल्पी का जन्म 16 दिसंबर
1911 को बुंदलखंड के पहाड़ी कसबे कुलपहाड़ जिला हमीरपुर में हुआ था. इनके पिता श्री
शीतल प्रसाद वहां तहसील में अहलकार थे. अपने तीन भाई और चार बहनों में ये सबसे
छोटे थे. चौबीस वर्ष की आयु में रावी अगरा आ गए. इस बीच सन् 1947 में रावी को
सिकंदर के निकट कैलास आश्रम ने आकृष्ट किया तो वहीं रहने लगे. रावी ने सामाजिक
रुढियों को तोड़कर अंतर्जातीय विवाह भी किया,परन्तु उनका दाम्पत्य जीवन अधिक साथ
नहीं चल पाया,मात्र 12 वर्ष साथ रहकर पत्नी लीलावती ने 29 मई
1959 को देह त्याग कर रावी को साहित्य साधना हेतु स्वतंत्र
कर दिया.
रावी की स्कूली शिक्षा विशेष नहीं
रही, उन्होंने हाईस्कूल तक ही शिक्षा ग्रहण की परन्तु अपने अध्ययन और स्वाध्याय को
जीवन पर्यन्त जारी रखा.
मौलिक साहित्य के क्षेत्र में रावी
का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है. रावी के विभिन्न कार्यों एवं प्रयोगों में
साहित्य ही ऐसी निधि है जो रावी को लम्बे समय तक चिर स्थाई रख सकेगी. लगभग सभी
विधाओं में रावी ने अपनी लेखनी का प्रयोग किया. उनकी सैकड़ों रचनाएँ छोटे बड़े
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में बिखरी हुई हैं. अपने जीवनकाल में रावी ने लगभग तीस से
अधिक पुस्तकें हिंदी साहित्य जगत को समर्पित की है.
अपनी लेखन यात्रा का आरम्भ रावी ने
इलाहाबाद से प्रकाशित होने वाली पत्रिका द्वारा किया. उनकी प्रथम कहानी ‘अपमानित
का मान’ सन् 1929 में इसी पत्रिका में प्रकाशित
हुई, इस दौरान कई छुट-पुट रचनाएँ ही निकलती रहीं लेकिन साहित्य सर्जन की वास्तविक
यात्रा सन् 1937 में गद्यकाव्य संग्रह ‘पूजा’ के प्रकाशन के
साथ आरम्भ हुआ. ‘पूजा’ के अतिरिक्त गद्यकाव्य की दूसरी पुस्तक ‘शुभ्रा’ सन्
1941 में प्रकाशित हुई.
रावी का जीवन लेखन के साथ साथ
प्रयोगों का भी रहा है. सन् 1943 से
46 तक रावी ने पुस्तकालय व्यवसाय को अपनाया. इस दौरान रावी ने आठ
आने से एक पुस्तकालय की स्थापना आगरा नगर में की. जिसका उद्देश्य घर–घर पाठकों तक
पुस्तकें पहुँचाना था. तीन वर्ष तक पुस्तकालय संचालन कर रावी ने नगर के ही एक
साहित्य प्रेमी सेठ स्व० रतनलाल जैन को दो हजार में पुस्तकालय बेचकर स्वयं घर-घर
जाकर पुस्तकें बेचने का कार्य आरम्भ कर दिया था. सर पर पुस्तकों से भरी टोकरी लिए
रावी शहर के गली मुहल्लों में घुमने लगे. इस कार्य से रावी को एक और जहाँ नए नए
अनुभव प्राप्त हुए वहीं दूसरी और जनसंपर्क से उनका विशाल परिचय श्रोत भी बन गया.
इन अनुभवों को रावी ने कलकत्ते से प्रकाशित ‘विशाल भारत’ मासिक पत्रिका में कई
अंकों में धारावाहिक रूप से प्रकाशित किया. इस डायरी के प्रकाशन से रावी की ख्याति
बहुत अधिक बढ़ गई थी. बाद में यह ‘बुकसेलर की डायरी’ के नाम से पुस्तकाकार रूप में
‘इंडियन प्रेस’.प्रयाग ने सन् 1947 में प्रकाशित की.
इस बीच रावी ने घर घर जाकर कहानियां
सुनाने का भी कार्यक्रम भी बनाया. सन् 1954 में भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार की संचालिका स्व० रमा जैन ने 150 रुपये मासिक पर एक वर्ष तक रावी को अपनी पुस्तक ‘हृदयों की हाट’ वार्ता को भारत भर के स्कूल कॉलेजों में सुनाने
के लिए दिए थे. तब रावी देश के विभिन्न स्थानों पर गए थे. इस दौरान ‘हृदयों की
हाट’ के अलावा रावी की अनेक पुस्तकें प्रकाशित चुकी थीं. प्रथम कहानी संग्रह ‘किसके लिए’ तथा दूसरा कहानी
संग्रह ‘पत्नियों का द्वीप’ सन् 1948 में प्रकाशित हुई.इसी वर्ष समाज चिंतन की पुस्तक ‘नया समाज:नया
मानव’ भी प्रकाशित हो गयी. अगले ही वर्ष उनका तीसरा कहानी संग्रह ‘उपजाऊ पत्थर’ भी
छपकर पाठकों के पास पहुँच गयी जो बाद में मद्रास विश्वविद्यालय के इंटरमीडिएट पाठ्यक्रम
में भी सामिल हो गया. इसके अतिरिक्त ‘प्रबुद्ध सिद्धार्थ’ नाटक सन् 1951 में प्रकाशित हो गयी. यह नाटक भी उत्तर प्रदेश इंटरमीडिएट कक्षाओं के
पाठ्यक्रम में पाठ्य पुस्तक के तौर पर कई वर्षों तक निर्धारित रहा.
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| रावी साहित्य |
‘नए नगर की कहानी’ रावी का विशिष्ट
उच्चकोटि का उपन्यास है. अब तक इसके कई संस्करण निकल चुके हैं. इस नितांत मौलिक
उपन्यास में रावी ने नए नगर और नए समाज की कल्पना को शब्दों द्वारा साकार किया है.
आज के साधारण,अर्धविकसित और दुर्बल चरित्र वाले समाज में से किस प्रकार एक नए,सुखी
समाज का जन्म हो सकता है यही इस उपन्यास में है. आगे चलकर यही उपन्यास यथार्थ रूप
में ‘नयानगर’ एवं ‘मैत्रीक्लब’ का आधार बना.
हिंदी साहित्य जगत ने रावी को
अपेक्षित सम्मान नहीं दिया. इसका कारण यह भी है कि हिंदी जगत अभी तक रावी के
साहित्य का उचित मूल्यांकन करने में
असमर्थ रहा है. इसके वावजूद भी रावी की कई पुस्तकें पुरस्कृत एवं प्रशंसित भी हुई
हैं. उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा रावी की दो पुस्तकों को पुरस्कृत भी किया है. सन् 1954
में कहानी संग्रह ‘कहानीकार’ एवं सन् 1956 में निबंध संग्रह "क्या मैं अन्दर आ सकता हूँ” पुरस्कृत
हुईं. इनके अतिरिक्त समाज चिंतन की पुस्तक ‘वीरभद्र की गोष्ठी’ भी पुरस्कृत रचना
है.
लघुकथाकार के रूप में रावी हिंदी के
उन गिने-चुने लघुकथाकारों में गिने जाते हैं जिन्होंने साहित्य की एक नयी विधा
‘लघुकथा’ को अपनी सैकड़ों लघुकथाओं से सम्रद्ध कर उस हिंदी साहित्य में उचित स्थान
प्रदान किया है. भारतीय ज्ञानपीठ दिल्ली ने रावी के दो लघुकथा संग्रह प्रकाशित
किये. ‘मेरे कथागुरु का कहना है’ शीर्षक लघुकथा संग्रह में लगभग डेढ़ सौ लघुकथाएं
दो खण्डों में प्रकाशित हैं. इनके अतिरिक्त ‘रावी की परवर्ती लघुकथाएं’ संग्रह में
भी रावी की उत्कृष्ट लघुकथाएं संग्रहित हैं.
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| रावी साहित्य |
कहानियां एवं लघुकथाएं लिखने की रावी
की अपनी विशिष्ट शैली है. पौराणिक आख्यान शैली में लिखी ये कहानियां ऊपर से सरल व
रोचक लगती हैं लेकिन इनमें अन्तर्निहित सन्देश अत्यंत गूढ़ है. प्रत्येक कहानी और
लघुकथा कुछ ना कुछ सन्देश अथवा आमंत्रण देती हुई प्रतीत होती हैं. जीवन की
सार्थकता और रोचकता के जो दृश्य एवं दृष्टिकोण उनकी कहानियों में है वह विश्व के
किसी भी साहित्य में दुर्लभ हैं.
रावी के कुछ कार्यकलापों रहस्यमय भी
समझा गया था. कनु एवं कनिष्ठतनु के नाम से वे सूक्ष्म जगत के कुछ ‘सीनियर्स’ से
जुड़े हुए थे. रावी के अन्तरंग मंडली के इन ‘सीनियर्स’ में डैडी,वीरभद्र,नीतराग,त्रिलोचन,हिमदा,स्नेहशिखा,वारिद
आदि प्रमुख हैं. ये ही आगे रावी की
‘वीरभद्र की गोष्ठी’, ‘नए नगर की कहानी’, ‘पचास पर्चे इराक्लब के’ आदि
पुस्तकों में प्रमुख पात्र बनाकर निकले हैं. हालाँकि इन ‘सीनियर्स’ का कोई दैहिक
अस्तित्व नहीं है. लेकिन रावी की पुस्तकों एवं ‘नए विज्ञापन’ पत्र में इनकी अनेक
रचनाएँ देखने को मिलती रही हैं. स्नेहशिखा की अनेक अंग्रेजी में उत्कृष्ट कवितायें
रावी के लेखनी के माध्यम से ही निकली हैं.
नीतराग वातायन कृत ‘उच्चतर
कामविज्ञान के सूत्र’ लघु पुस्तक को रावी ने अपने जीवन की महत्वपूर्ण पुस्तक माना
है. इस पुस्तक में मात्र नौ सूत्र दिए गए है. परन्तु इन सूत्रों का महत्त्व व्यापक
है. रावी का कहना है कि ये सूत्र उन्हें मनस्तरीय तरंगों (टेलीपैथी) द्वारा
प्राप्त हुए हैं. इन सूत्रों में नीतराग ने नारी पुरुष युग्म के उर्ध्वांग मिलन
(आलिंगन एवं चुम्बन) के महत्त्व को प्रसारित किया है रावी का मानना है कि यौनरति
से ऊपर उठकर आलिंगन एवं चुम्बन के द्वारा भी नारी पुरुष पर्याप्त जीवन पोषक तत्व व
उत्तरोत्तर तृप्तिकारक सुख को प्राप्त कर सकते हैं. इस पुस्तक में रावी केवल
भाष्यकार एवं प्रस्तोता के रूप में सामने आये हैं.
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| साहित्यकार विष्णु प्रभाकर द्वारा रावी का अभिनन्दन |
अपने चिंतन एवं लेखन को यथार्थ रूप
में परिणित करने के लिए प्रयोगधर्मी रावी ने कई प्रयोग किये.जिनमें
मैत्रिक्लब,नयानगर,अग्रसर नैतिक काम विज्ञान संस्थान,जीवन प्रवेश विद्यालय आदि
प्रमुख हैं.
मैत्रीक्लब की विधिवत स्थापना रावी
ने कुछ मित्रों को लेकर 12 जुलाय 1957 में की. कैलास आश्रम में गठित इस मैत्रीक्लब संस्था से देश के अनेक
प्रख्यात बुद्धिजीवी जुड़े. जिनमें अनेक प्रसिद्द साहित्यकार,पत्रकार,सम्पादक,प्रशासनिक अधिकारी,राजनीतिज्ञ हैं. पूर्व में अमर उजाला दैनिक के संस्थापक स्व०
डोरीलाल अग्रवाल,स्व० जैनेन्द्र कुमार ,स्व० क्षेमचंद ‘सुमन’ पद्म सिंह शर्मा
‘कमलेश’,बनारसीदास चतुर्वेदी जैसे प्रबुद्ध साहित्यकार जीवन पर्यंत मैत्रीक्लब के
सदस्य बने रहे. बाद के वर्षों में भी इस क्लब में काका हाथरसी,विष्णुप्रभाकर,आचार्यसर्वे,अखिलविनय,कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’, ‘पद्मश्री’ गोपालदास
‘नीरज’, बुधमल शामसुखा, राजेंद्र अवस्थी, डा० महाराज कृष्ण जैन आदि मनीषी भी जुड़े.
मैत्रीक्लब की गोष्ठियां को रावी हर वर्ष देश के विभिन्न स्थानों में नियमित रूप
से आयोजित भी करते रहे. उनके निधन के बाद अब मैत्रीक्लब क्लब की गोष्ठियों में
शिथिलता आ गयी है. मूलरूप से इस संस्था का उद्देश्य समाज में एक दुसरे के सुख-दुःख
तथा आवश्यकताओं की जानकारी एवं पारस्परिक सहज सहयोग के द्वारा सच्चे एवं गहरे
मानवीय संबंधों का निर्माण करना है.
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| मैत्रिक्लब शिविर में रावी मित्रों के साथ |
क्लब के उद्देश्यों को पूरा करने के
लिए 49 वर्ष पूर्व सन 1964 में
रावी के संपादकत्व में ‘नए विज्ञापन’ मासिक पत्र का भी प्रकाशन किया गया. समाज एवं
मानव की साधारण तथा असाधारण इच्छाओं ,आवश्यकताओं का विज्ञापक और पूरक यह मासिकी
अपने आप में हिंदी की एकमात्र अनोखी पत्रिका है. साहित्य में ‘मनोविज्ञापन’ नाम की
एक नयी विधा का विकास रावी ने इसी पत्रिका के माध्यम से किया था.
नए नगर का निर्माण भी रावी का एक
विशिष्ट आयोजन रहा है इसकी आधार-शिला कैलास के निकट ही एक भूखंड(नयानगर) पर रखी जा
चुकी है. जीवन निर्वाह की चिंताओं से मुक्त,मधुरतम मानवीय संबंधों और जीवन के
उच्चतम विकास के साधन एवं सुविधाओं से संपन्न पचपन परिवारों को बसाने का रावी का
सपना रावी के देहावसान से प्रभावित हो गया है. रावी का यह सपना कब और कैसे पूरा
होगा ये उनके मित्रों के लिए अब चिंता की बात है.
रावी का जीवन दर्शन मानव मानव का
प्रेम तथा मानवीय संबंधों पर आधारित है. उनका विश्वास है कि दुनिया में वह सब कुछ
है जो मानव की प्रगति और सुख सुविधाओं के लिए आवश्यक है. कोई भी दो मनुष्य यदि एक
दुसरे के जीवन और ह्रदय में घुसकर अपनी इच्छा ,आवश्यकता और दुसरे की सुविधा के
अनुसार खुलकर लेन देन कर सके तो उन दोनों की सुख समृद्धि में वृद्धि हो सकती है.
षड्बिन्दु वृत्त योजना के द्वारा रावी ने अनेक मित्रों को इस दिशा में सफलता
पूर्वक गहन प्रयोग के लिए अग्रसर भी किया है.
रावी कभी पलायनवादी नहीं रहे और ना
ही निराशावाद उन्हें प्रभावित कर पाया.
रावी के साहित्य में वर्तमान कृत्रिम जीवन एवं कथित शिष्टाचार के संबंधों के प्रति
समग्र क्रांति दृष्टिगोचर होती है. वे सरल,सहज,मधुरतम प्राकृतिक जीवन की पवित्रता
के उपासक रहे हैं. जीवन को सहज रूप में जीने वाले रावी का सम्पूर्ण जीवन भले ही
धनाभाव से ग्रसित रहा हो, लेकिन आध्यात्मिक सुखों के विशाल खजाने की चाबी सदा उनके
पास रहने के कारण बहुतो को उनसे इर्ष्या ही रही है.
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| रावी जी ब्लोगर सुनील अनुरागी के साथ |
बहुमुखी,बहुआयामी
प्रतिभा के धनी रावी को आज भी हिंदी जगत उपेक्षित ही कर रहा है. जबकि रावी का
अधिकाँश साहित्य उच्चकोटि का विश्वस्तरीय है. यद्यपि रावी को कोई बहुत बड़ा
पुरस्कार अथवा सम्मान नहीं मिला हो. वैसे भी साहित्य में राजनीति के प्रवेश ने
सम्मानों को प्रभावित करना आरम्भ कर दिया है. लेकिन पाठकों के बीच रावी का सम्मान
सर्वोच्च रहा है. इस बात को बड़े बड़े पुरस्कार प्राप्त साहित्कार भी मानते रहे हैं.
हिंदी जगत को चाहिए कि रावी के व्यक्तित्व और कृतित्व का उचित मूल्यांकन कर उन्हें
साहित्य जगत में उचित स्थान दिलाये. अगर
हिंदी जगत रावी का उचित मूल्यांकन करने में असमर्थ हुआ तो भविष्य में आने
वाली पीढियां अपने एक महान जीवन-शिल्पी,चिन्तक,कथाकार को विस्मृति के गर्त में
धकेल देगी निश्चय ही यह स्थिति हिंदी जगत के लिए अत्यंत दुर्भाग्य की बात होगी.
-सुनील
अनुरागी
लेबल:
आलेख
स्थान:कोटद्वार,उत्तराखंड
tadkeshwar nagar gate no 1 durgapur, Kotdwar, Shiv Rajpur, Uttarakhand 246149, भारत
रविवार, 31 मार्च 2013
भारतीय राजनीति का अजब खेल ..निजी बयानबाजी या राजनीतिक साजिश
आजकल कुछ ऐसे ही नेता इस बीमारी से बुरी
तरह पीड़ित हैं. सवाल ये है कि जब कोई नेता या किसी राजनितिक दल का प्रवक्ता सार्वजनिक रूप से कोई विवादित बयान देता है तो
यह बयान किसी भी रूप से उसका निजी कैसे हो सकता है ? अगर वह किसी पार्टी में
या सरकार में किसी पद पर है तो यह और भी गंभीर बात है . सार्वजनिक जीवन से जुड़े व्यक्ति के बयान को निजी बताना बेवकूफी नहीं तो और क्या कह सकते है.
पहली बात तो ये है कि राजनीति में
प्रवेश करना ही सार्वजनिक जीवन में प्रवेश करना होता है. उसकी हर जन प्रतिनिधियों के सार्वजनिक कृत्य पर जनता की
नजर होनी ही चाहिए.जनता को उसके बार में जानने का नैतिक अधिकार भी है. इस बात पर सवाल उठाना लोकतंत्र की अवधारणा को कमजोर करना है. जिन नेताओं को निजि जीवन में किसी की दखलंदाजी
पसंद नहीं वे सार्वजनिक जीवन से खुद को हटा सकते हैं. अगर किसी को अपना निजी जीवन ज्यादा महत्वपूर्ण लगता है तो उसे सार्वजनिक जीवन में नहीं बने रहना चाहिए। राजनीतिज्ञों के लिए सार्वजानिक जीवन में बने रहना कोई संवैधानिक मजबूरी नहीं है.
निजी बयान को किसी ने अभी तक परिभाषित
नहीं किया है. जब किसी की कोई बात सार्वजनिक हो जाती है तो वह किसी का निजी कैसे
हो सकता है. अगर किसी को अपनी निजी बात किसी से कहना है तो उसे व्यक्तिगत रूप से किसी
को अपने घर में बुलाकर कह सकता है. टीवी चेनल ,मिडिया को प्रेस वार्ता चलाकर अपनी
बात कहना निजी नहीं हो सकता है. इसे निजी भी तभी माना जा सकता है जब वह मिडिया को पहले
ही बता दे कि कहे कि उसकी वार्ता एकदम निजी है इसे टीवी ,अखबारों में कदापि ना
दिखाएँ. लेकिन होता इसका उल्टा है .पहले वार्ता जोर-शोर से मोडिया में उछाला जाता
है. फिर उसकी प्रतिक्रिया देखी जाती है. अगर जनता में सन्देश नकारात्मक चला गया या बयान विवादित हो गया तो पार्टी या सरकार उस बयान से अपना पला झाड़ कर उसे
निजी बयान बताकर मांमले को दबाने की कोशिस करने लगती है .
राजनीतिज्ञों को सार्वजनिक रूप से बयान
देने से स्वयं सचेत रहना चाहिए. लेकिन अब ऐसा बहुत कम हो रहा है. ये राजनितिक
मूल्यों का अवमूल्यन होने का उदाहरण है. भारतीय राजनीति अब हर क्षेत्र में विवादित
रूप ले रही है. जनता का विश्वास राजनीतिज्ञों से लगातार उठाता जा रहा है. अगर यही
हाल रहा तो लोकतंत्र की मूल अवधारणा ना केवल पूरी तरह समाप्त हो जायेगी बल्कि यह
कुछ लोगों की बंधक भी बन कर रह जायेगी.
मिडिया को भी चाहिए कि वह ऐसे विवादित बयानों को ज्यादा महत्व ना दे. इससे न केवल लोकतंत्र को नुकसान पहुंचता है बल्कि जनता के धन व समय की भी बर्बादी होती है.
शनिवार, 9 मार्च 2013
बसंत आया
डाल-डाल पर,शाख-शाख
पर
नव पल्लवित पत्रों
में
हरीतिमा लाया ,बसंत
आया.
मिटी
उदासी,खिली खुशियाँ
दूर देश से प्रियतम का,
संदेशा लाया,बसंत आया.
गई ठिठुरती
रातें,बिखरी उमस की सुबह
हर मन के अंतर्मन
में
उमंगों की फुहार लाया,बसंत
आया.
आंगन-आंगन में,द्वार-द्वार पर
सतरंगी इन्द्रधनुषों का
बहार लाया ,बसंत आया.
कण-कण में ,जीव-जीव
पर
नव यौवन का
संचार लाया ,बसंत
आया.
शनिवार, 10 नवंबर 2012
द्रुत विकास के झूठे नारों से,दुर्गति देश की कर बैठे
द्रुत विकास के झूठे नारों से, दुर्गति देश की कर बैठे .
भ्रष्टाचार की बहती आंधी में, झोला अपना भर बैठे.
केजरी बहकाए जनता को, पर ना सुधरेंगे हम कभी,
भ्रष्टाचार विरोधी अन्दोलनों से,भले थोड़ा सा हम डर बैठे.
भ्रष्ट तंत्र की ताकत को, दुनिया देख रही भारत में,
सच को झूठ बनाकर,राजा,कलमाड़ी को बाहर कर बैठे.
हमारे ठाठ में न रहे कमी,रहना सदा हमारे झांसे में,
डर हमको केवल इतना है,वोटर हमारे मुकर ना बैठे.
जनता के पैसे की लूट मचाने,हम जमें हैं सत्ता में,
हम लुटेरों के वंशज हैं,ये सच अब बयां हम कर बैठे .
कुंडलियाँ
प्रजातंत्र के इस दौर में,आ गयी है मौज.
भ्रष्टाचार,दलाली में, लगी लुटेरों की फ़ौज,
लगी लुटेरों की फ़ौज,देश हो रहा बदनाम.
मंहगाई के बोझ से, जीना हुआ हराम.
देखत कवि ‘अनुरागी’,सत्ता का ये मंत्र.
नेता दलाल मौज में,बंधक बना प्रजातंत्र.
भारत के लोकतंत्र में,जनता हुई हलाल,
होते रोज घोटालों से,लुटता देश का माल.
लुटता देश का माल,अब क्या होगा भाई,
देश डूबे घोटालों में,नेता चाट रहे मलाई.
रोवत कवि ‘अनुरागी’,देख सत्ता के धंधे,
पब्लिक चिल्लाये सड़कों पे,नेता हो गए अंधे.
राजनीति
के घाट पर,लगी लोकतंत्र को ठण्ड,
नित नए घोटालों से ,मिला जनता को दंड.
मिला जनता को दंड, डायन मंहगाई खा गयी,
सत्ता के दलालों को,घोटालों की
दुनिया भा गयी.
दुखी कवि ‘अनुरागी’, अब कौन सुने आपबीती,
नैतिकता,सदाचार को, खा गयी पूरी राजनीति.
बुधवार, 12 सितंबर 2012
‘इंडियन’ या ‘इडियट’
ब्रिटेन से बाहर निकलकर अंग्रेज
जहां जहां भी साम्राज्य के विस्तारीकरण के लिए गए. वहां उन्होंने खुद को न केवल सभ्य
बताया बल्कि साथ ही स्थानीय लोगों को अपनी आदत के अनुसार हमेशा असभ्य,मूर्ख ही घोषित
किया. यही नहीं उनके साथ अछूतों जैसा व्यवहार भी किया. स्थानीय निवासियों को ‘इडियट’
कहकर अपमानित करते हुए अंग्रेजों ने बाद में उन्हें अपने दस्तावेजों में इस शब्द में
मामूली परिवर्तन कर वहां के आदिवासियों के लिए ‘इंडियन’ भी लिखना शुरू कर दिया.
अमेरिका के काले मूल आदिवासी नागरिक
जिन्हें ‘हब्सी’ भी कहा जाता है. विश्व भर में अंग्रेजों द्वारा प्रचलित तथाकथित
नवीन सभ्यता में उन्हें ‘सेमीनोले इंडियन’ के नाम जाना जाता है. उन्हें न केवल
ह्येय दृष्टि से देखा गया अपितु उन पर अंग्रेजों द्वारा अत्याचार भी बहुत किये गए.
सभ्यता के प्रतीक कहे जाने वाले अमेरिका
में मानवाधिकारों से भी उन्हें कई दशकों तक वंचित भी रखा गया.
इसी तरह उत्तरी अमेरिका में भी तथाकथित असभ्य अन्य मूल आदिवासियों को ‘रेड इंडियन’,
अफ्रीका में मूल आदिवासियों को ‘ब्लेक इंडियन’ कहा. जब अंग्रेजों ने भारत का रुख
किया तो उन्हें यहाँ के लोग भी ‘इडियट’ ही नजर आये. ब्रिटिश शासन काल में अंग्रेजों
ने यहाँ की जनता को अपनी ह्येय मानने की दृष्टि के मानसिकता के कारण देश के कई
स्थानों पर “डॉग एंड इंडियन नॉट अलाउड” के बोर्ड लगा दिए थे. क्योंकि अंग्रेज
मानते थे कि पश्चिमी सभ्यता के मुकाबले ये भारतीय अत्यधिक असभ्य,अशिक्षित और
बुद्धिहीन हैं. इसीलिये अंग्रेजों ने भारतीयों के लिए भी अमेरिका,अफ्रिका के मूल आदिवासियों
की तरह यहाँ के निवासियों को भी ‘इडियट’ या ‘इंडियन’ ही कहना शुरू कर दिया. ‘इंडियन’
शब्द का मूल ‘इडियट’ ही है. साफ़ जाहिर है ‘इंडियन’
से ही ‘इंडिया’ की उत्पत्ति हुई ना कि ‘इंडिया’ में रहने वालों के कारण ‘इंडियन’ शब्द
की. सवाल ये है कि अगर भारतीय ही
इंडियन हैं तो फिर अमेरिका,अफ्रिका के मूल निवासियों को ‘सेमीनोले इंडियन’,‘रेड
इंडियन’, ‘ब्लेक इंडियन’ क्यों कहा गया? सवाल ये भी है कि ये 'इंडियन' शब्द अंग्रेजों ने हर जगह किस उद्देश्य से प्रयोग किया ?
बड़े दुःख के साथ कहना पड़ रहा है कि आज भी हम अंग्रेजों द्वारा दी गयी सिर्फ सत्ता
हस्तांतरण की राजनीतिक आजादी के बाद भी मानसिक,बौद्धिक रूप से पश्चिमी सभ्यता के
अनुकरण में बुरी तरह जकड़े हुए हैं. हम आज भी अपमान का प्रतीक ‘इंडियन’ शब्द को
तिलांजलि देने के बदले उसपर गर्व करते नहीं थक रहे हैं.
लेबल:
विचार
स्थान:कोटद्वार,उत्तराखंड
कोटद्वार, उत्तराखण्ड, भारत
गुरुवार, 5 जुलाई 2012
जनप्रतिनिधि कानून और चुनाव सुधार
स्वस्थ
लोकतान्त्रिक प्रणाली को चलाने के लिए चुनाव सुधार और जनप्रतिनिधि कानूनों में
सुधार या संशोधन एक सतत प्रक्रिया है.जिसमें समय की आवश्कतानुसार संसद में ऐसे
संशोधन अथवा नए कानून बनाए जाते हैं,जो लोकतान्त्रिक व्यवस्था को सुदृढ़ ही ना करें
अपितु जिसमें जनता की आंकाक्षाओ का भी सम्मान हो.
भारत में चुनाव सुधारों के नाम पर आज तक जितने भी चुनाव-सुधार कानून बने या सशोधित
किये गए हैं वे समय कि कसौटी पर खरे नहीं उतारे हैं. दलबदल कानून राजनितिक दलों के
लिए सरकार बनाने में सहायक ही सिद्ध हुए हैं. इस कानून से एक तिहाई की संख्या में
तोड़ने,खरीदने की खुली छूट मिल गयी है. चुनाव-सुधार के नाम पर किये गए ९१वां संविधान
संशोधन में दलबदल करने पर संसद या विधानसभा में ३३% से कम सदस्यों पर देखने में
भले ही प्रतिबन्ध लगाया हो लेकिन इससे खरीद फरोक्त,गोपनीय समझौतों से दलबदल
कराने,करने में कोई कमी नहीं आयी है. जनप्रतिनिधि
कानूनों में अब तक के संशोधनों से अपराधियों,भ्रष्ट लोगों का राजनीति में प्रवेश
और भी आसान हो गया है. इससे लोग जेल में रहकर भी चुनाव लड़ और जीत सकते हैं. पहले जिनके पीछे पुलिस
रहती थी. जनप्रतिनिधि चुने जाने के बाद पुलिस को उनकी सुरक्षा करनी पड़ती है. कारण
साफ़ है. जनप्रतिनिधि कानूनों में सुधार
आधे अधूरे मन से किये जाते हैं और जानबूझकर कानून में ऐसी त्रुटियाँ छोड़ दी जाती हैं जिससे उसका प्रभाव राजनीतिज्ञों,राजनीतिक
दलों के हितों पर ना पड़ सके.
चुनाव सुधारों के सम्बन्ध में अब तक
प्रयासों को देखा जाय तो उससे राजनीतिक दलों की इच्छाशक्ति की ही पोल खुलती है दो
वर्ष पूर्व के जनप्रतिनिधि अधिनियम में हुए संशोधन देखकर तो यही लगता है. इस
संसोधन चुनाव में खड़े होने वाले प्रत्याशियों की जमानत राशि में वृधि कर लोकसभा
चुनाव के लिए १०,००० से बढ़ाकर १५,००० विधान सभा में ५,००० से बढ़ाकर १०,००० रुपये
की गयी है इसी तरह चुनाव में प्रत्यासियों द्वारा खर्च की जाने वाली राशि को भी
कुछ बढ़ाया गया है. समझ में नहीं आता कि सिर्फ इतने मामूली संसोधन से लोकतंत्र को
कैसे और कहाँ मजबूती मिलेगी ? ऐसे संसोधनों से ना तो राजनीति का अपराधीकरण रुक
सकता है और न ही व्यवस्था में सुधार होगा.
चुनाव सुधारों के सम्बन्ध में कुछ विचार
यहाँ दिए जा रहे हैं ,जिनकी ओर ध्यान दिया जाय तो सुधार की कुछ उम्मीद बन सकती है.
संसद या विधान सभाओं में इन पर क़ानून बनाना तो दूर कभी गंभीर चर्चा तक नहीं हुयी
है. सत्ता पक्ष हो या विपक्ष आखिर मौसेरे भाई ही तो हैं. वे क्यों खुद पाने पैरों
पर कुल्हाड़ी मारना चाहेंगे ? जनता,मीडिया के दबाव में आकार अगर कभी उन्हें प्रभावी
ठोस कानून बनाना पड़े तो उससे पहले ही वे अपने बचाव के लिए क़ानून में खामियां छोड़ना
नहीं भूलते. इसका ताजा उदाहरण हाल ही में संसद में पेश जनलोकपाल बिल की मौजूदा
स्थिति है.जनभावनावों के विपरीत जाकर सरकार ने प्रस्तावित जनलोकपाल बिल के टुकड़े
टुकड़े कर बिल को प्रभावहीन करने की पूरी साजिश की है. सरकार और विभिन्न दलों के
राजनेताओं,संसद सदस्यों द्वारा प्रस्तावित जनलोकपाल बिल पर किये गए आचरण ने उनकी
प्रतिष्ठा को अत्यधिक हानि पहुंचाई है. जिसकी भरपाई अब निकट भविष्य में होनी
मुश्किल है.
जन प्रतिनिधियों के लिए न्यूनतम
शेक्षिक योग्यता रखने का प्रस्ताव काफी समय से लंबित है. क्योंकि आज के सन्दर्भ
में शिक्षित जनता का प्रतिनिधत्व
अशिक्षित,विवादित जनप्रतिनिधि करें, लोकतंत्र का इससे बड़ा अपमान और क्या हो सकता
है ?
हमारे देश में लोकतंत्र बहुदलीय
राजनीतिक व्यवस्था पर आधारित है. दल विशेष की नीतियों के नाम पर मतदाताओं से मत
मांगे जाते हैं. प्रत्येक राजनीतिक दल अपनी पार्टी की नीतियों ,विचारों को घोषणा
पत्र के माध्यम से मतदाताओं के समक्ष रखता है जिसके आधार पर मतदाता प्रत्याशी को
वोट देता है अगर दल विशेष का प्रत्याशी जनप्रतिनिधि बनकर निजी राजनीतिक स्वार्थ के
लिए दल बदल कर उस विचारधारा,धोषणाओं को त्याग देता है जिसके आधार पर उसे जनता ने
चुना है, तो यह निश्चित ही मतदाताओं के साथ धोखाधड़ी होगी. खेद है कि जनप्रतिनिधि
के ऐसे कृत्य को अपराध की श्रेणी में रखने के बदले उसे ‘माननीय’बना दिया जाता है.
दलबदल के समस्या को समाप्त करने और
जनभावनाओं का सम्मान करने के लिए आवश्यक है कि चुना गया जनप्रतिनिधि पुरे कार्यकाल
में उसी दल से संबद्ध रहे. अगर वह अपनी दलीय निष्ठा बदलना चाहता है तो सम्बंधित
दल या गठबंधन से त्यागपत्र देकर नए दल की नीतियों
के आधार पर पुनः मतदाताओं से जनादेश प्राप्त करना चाहिए. मतदाताओं की दलीय निष्ठा व समर्थन को व्यतिगत
निष्ठा में बदलने का अधिकार जनप्रतिनिधि को न संवैधानिक है और ना ही नैतिक.
उम्मीदवार के दो स्थानों से चुनाव लड़ना व
जीतना फिर किसी एक चुनाव क्षेत्र से त्यागपत्र देना उस चुनाव क्षेत्र के मतदाताओं
के साथ जहाँ एक ओर विश्वासघात है, वहीँ यह सरकारी धन के खुलेआम दुरूपयोग का भी
नमूना है. संसदीय एवं विधानसभाओं चुनावों इससे सरकारी धन का ही नहीं उस चुनाव
क्षेत्र में अन्य उम्मीदवारों का भी काफी धन व समय नष्ट हो जाता है.
दो स्थानों से चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार
अक्सर भारतीय राजनीति के वे धुरंधर खिलाड़ी होते हैं जो किसी भी कीमत पर हार कि कोई
संभावना नहीं रखना चाहते या जीत की संभावना को बढ़ा देना चाहते हैं. उन्हें पता है
कि उनकी इस विजय-लिप्सा के कारण जनता व सरकारी मशीनरी दोनों को भारी हानी होती है.
लेकिन उन्हें इसकी प्रेरणा संविधान की दुर्बलताओं के कारण मिलती है.
केंद्र व राज्यों में दल विशेष को
पर्याप्त बहुमत न मिलने के कारण गठबंधन सरकारों का दौर चल पड़ा है .राजनीतिक
महत्वाकांक्षा के चलते ऐसी सरकारें कभी
कभी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाती हैं ऐसी स्थिति में मध्यावधि चुनाव देश की
विकास प्रक्रिया को अवरुद्ध कर देती है साथ ही अरबों रूपों का व्ययभार भी देश की
अर्थव्यवस्था पर बोझ बनकर आ जाता है. चुनाव अधिघोषणा से लेकर चुनाव प्रक्रिया
पूर्ण होने तक विकास के भी लगभग ठप्प हो जाते हैं.इं परिस्थितियों से भी बचने की
आवश्कता है गठबंधन सरकारों के इस युग में एक हाथ से समर्थन देने और दूसरे हाथ से
समर्थन वापस लेने की कुटिलता राजनीतिक दलों के लिए सामान्य सी बात हो गयी है सरकार
को समर्थन देते समय समर्थन की समय-सीमा स्पष्ट उल्लेख न करना व ‘बाहर से समर्थन
देना’ राजनीतिक दलों की इसी कुटिलता को दर्शाता है. हर हालत में निर्वाचित संसद और
विधानसभाएं अपना पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा करें इसकी व्यवस्था संविधान में होनी
चाहिये. जरूरी नहीं है कि दलीय स्थिति में बड़े परिवर्तन हो ही जाए.
विश्व के कई देशों में जनता की इच्छाओं
के अनुरूप कार्य न करने वाले जनप्रतिनिधियों को प्रतिनिधिसभा से वापस बुलाने का
प्रावधान उनके संविधान में किया गया है, जबकि भारत में इस पर अभी विचार भी नहीं
किया गया है. हमारे देश में लोकतंत्र का स्वरुप लगातार विकृत होता जा रहा है. देश
की जनता को अकर्मण्य,विवादित,भ्रष्ट जनप्रतिनिधियों को पुरे कार्यकाल तक झेलना
पड़ता है. इससे न केवल उस क्षेत्र का विकास पिछडता है बल्कि क्षेत्र की समस्याओं का समय पर समाधान न होने से जन
समस्याएं और अधिक बढ़ जाती हैं.
लोकतंत्र
का आधार मतदान है, तो प्रतिनिधित्व का आधार बहुमत है. हमारे यहाँ विडम्बना यह है कि
कम व सिमित मतदान में भी लोकतंत्र पैदा कर दिया जाता है. जबकि इसके लिए कुल
मतदाताओं का ५१% मतदान अनिवार्य होना चाहिए.
राजनितिक दलों में कितने भी मतभेद हों लेकिन उनमें सरकारी खजाने से चाव खर्च की
मांग करने एवं सांसदों,विधायकों के वेतन
भत्ते व अन्य सुविधाएँ बढ़ाने में कोई मतभेद आज तक सामने नहीं आया है. जब जनता को
सुविधाएँ बढ़ाने की बात आती है तो इन्हीं
जनप्रतिनिधियों के ढेरों कुतर्क,विवशताएं सामने आ जाते हैं.
भ्रष्टाचार और काले धन ने आज के समय में
राजनीतिज्ञों में अपनी जड़ें मजबूत कर ली हैं. राजनीतिज्ञों,जनप्रतिनिधियों की छवि
जनता की नज़र में लगातार गिरती जा रही है. जनता अब राजनीति का शुद्धिकरण चाहती है
वह चाहती है कि राजनीति में वे ही लोग आगे आकर उनका प्रतिनिधित्व करें जो न तो भ्रष्टाचार
या अन्य आपराधिक मामलों में विवादित हों और न ही जिनकी छवि किसी कारण धूमिल हो.
चुनाव सुधारों के नाम पर आज तक जो भी प्रयास
किये गए हैं वे सभी ढोंग व नकारा ही साबित हुए हैं. हमारे राजनीतिज्ञों में अभी वह
इच्छाशक्ति जागृत ही नहीं हुई है जो स्वच्छ लोकतंत्र को नई दिशा दे सके.
भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनता के विरोध की जैसी बयार वर्तमान में हमारे देश में चल
रही है. वह भविष्य में क्या सकारात्मक परिणाम देगी कहना मुश्किल है.
गुरुवार, 8 मार्च 2012
जब मस्ती लेनी हो होली में
जब मस्ती लेनी हो होली में,
तो आजा मेरी खोली में.
इशारों से अब काम न चलेगा,
कर लो बातें बोली में .
कीचड़ में अब हाथ ना डालो,
गुलाल छुपा है चोली में.
दिल से दिल का भेद मिटा दो,
प्यार बढाओ होली में.
राजनीति की अब बातें छोड़ो,
फाग सुनाओ टोली में.
बैरी को भी गले लगा लो,
यार बना दो होली में.
तो आजा मेरी खोली में.
इशारों से अब काम न चलेगा,
कर लो बातें बोली में .
कीचड़ में अब हाथ ना डालो,
गुलाल छुपा है चोली में.
दिल से दिल का भेद मिटा दो,
प्यार बढाओ होली में.
राजनीति की अब बातें छोड़ो,
फाग सुनाओ टोली में.
बैरी को भी गले लगा लो,
यार बना दो होली में.
शनिवार, 11 फ़रवरी 2012
लघुकथा भूकंप पीड़ित
भूकंप पीड़ित
उन चारों आवारा किस्म के नवयुवकों को देखकर मुझे आज प्रसन्नता ही हुई. मुझे लगा कि समाचारपत्रों,टीवी में भूकंप पीड़ितों की दशा सुनकर इनके दिल में भी अब मानवता की भावना जाग्रत हो चुकी है. तभी तो वे बड़ी तत्परता से शहर में घूम-घूम कर देश के एक क्षेत्र में आये भयंकर भूकंप से पीड़ित लोगों के लिए धन एकत्र करने में लगे हुए थे. उनके पास एक कनस्टरनुमा डिब्बा था. डिब्बे के उपरी हिस्से में एक सुराख था जिसमें लोग रुपये, सिक्के डालते जाते थे, डिब्बे पर लिखा था –“भूकम्प राहत कोष “.
मानवता के प्रति उनकी सदाशयता का में कायल हुआ. मैंने भी एक पाँच रुपये का नोट निकालकर डिब्बे के हवाले कर दिया.
सदा की भांति में शाम को शहर के किनारे कम भीड़ भाड़ वाली जगह पर स्थित एक होटलनुमा ढाबे
की ओर चला गया. इसी ढाबे के ठीक सामने अंग्रेजी शराब की दूकान भी थी. ठेके से एक 'अद्धा' लेकर
मैं ढाबे के एक कोने में बैठकर अपने कार्यक्रम में व्यस्त हो गया.
-“यार, आज तो खाली पकौड़े,नमकीन से काम नहीं चलेगा .आज की कमाई अच्छी रही पुरे आठ सौ रूपये डिब्बे से निकले हैं, मेरी मानो तो आज चार तंदूरी मुर्गे का भी आर्डर दे दो.”
आवाज सुनकर जब में घूमा तो मेरी नजर उन्हीं चार लडकों पर पड़ी जो भूकंप पीड़ितों के लिए पैसे इकट्ठे
कर रहे थे, उनमें से एक यह कहता हुआ ‘एरिस्ट्रोक्रेट’ की बोतल का ढक्कन खोल रहा था.
भूकम्प राहत कोष का डिब्बा बैंच के नीचे पड़ा हुआ था, उसे देखते हुए मुझे अपने ‘अद्धे’ का असर
खत्म होता हुआ सा महसूस हुआ.
बुधवार, 8 फ़रवरी 2012
कुण्डलियाँ
लाठी मेरी देखा कर ,भैंस रह गयी दंग,
शक्तिवान सावंत तुम,चल रही हूँ संग.
चल रही हूँ संग,लाठी की ताकत न्यारी.
सबल के बल पौरुष से ,निर्बल चली बेचारी.
कह कवि 'अनुरागी',जग की यही परिपाटी ,
होगी भैंस उसी की ,हाथ में जिसके लाठी .
मक्खन में गुण बहुत हैं ,सभी जानते आज.
सभी जगह पूजते फिरें, जो हैं मक्खनबाज .
जो हैं मक्खनबाज,उन्हीं का आज ज़माना ,
वही मजे में, जो मक्खन का दीवाना .
कहे कवि ' अनुरागी' आप भी मक्खन लीजे ,
सफल जीवन के लिये,मक्खन की मालिश कीजे.
कवि सम्मलेन के मंच पर ,आओ खेलें होली .
छंद करें स्वच्छंद , फाड़ कविता की चोली.
फाड़ कविता की चोली, घिसें शब्दों के पेड़ ,
कविता बांचे हास्य की , मार श्रोता की रेड़.
कहे कवि 'अनुरागी', मिले जीवन का मृदुफल तभी ,
साहित्य जगत के उपवन में,जब कहलाये वह हास्यकवि
रविवार, 5 फ़रवरी 2012
आजाद देश वीरान हुआ
भारत का हर प्राणी, सहमा सहमा सा देख रहा ,
हम सब भारतवासी हैं, फिर कैसा ये भेद रहा .
कारखाने खुले नगर नगर में, फिर क्यों बेरोजगारी आयी,
नेता अफसर करें मौज,पर जनता ने महंगाई पायी .
मनोबल ऊँचा था उनमें,कह्ते जिन्हें स्वतन्त्रता सेनानी ,
कैसे देश आजाद हुआ,इसकी कीमत किसने जानी.
कोसें हम उस क्षण को,जब खंडित यह देश हुआ ,
शत्रु बना पाकिस्तान ,सीमाओं पर क्लेश हुआ.
अपने ही भाई अपनों का रक्त बहाते नित्य हैं
बहनें बनती विधवाएं ,कैसा निर्मम कृत्य है.
विकट हुई देश की हालत,समस्याओं का अम्बार लगा,
इधर गिरती फूस की झोपड़ी,उधर महलों का बाजार लगा .
अब अपने ही श्रम का ,मोल नहीं हम पाते हैं,
हमें लूटते चंद लुटेरे ,बोल नहीं हम पाते हैं .
छिनी खुशियाँ,चली बंदूकें,चौराहा लहुलुहान हुआ ,
सत्ता के भ्रष्ट दलालों से,आजाद देश वीरान हुआ.
हम सब भारतवासी हैं, फिर कैसा ये भेद रहा .
कारखाने खुले नगर नगर में, फिर क्यों बेरोजगारी आयी,
नेता अफसर करें मौज,पर जनता ने महंगाई पायी .
मनोबल ऊँचा था उनमें,कह्ते जिन्हें स्वतन्त्रता सेनानी ,
कैसे देश आजाद हुआ,इसकी कीमत किसने जानी.
कोसें हम उस क्षण को,जब खंडित यह देश हुआ ,
शत्रु बना पाकिस्तान ,सीमाओं पर क्लेश हुआ.
अपने ही भाई अपनों का रक्त बहाते नित्य हैं
बहनें बनती विधवाएं ,कैसा निर्मम कृत्य है.
विकट हुई देश की हालत,समस्याओं का अम्बार लगा,
इधर गिरती फूस की झोपड़ी,उधर महलों का बाजार लगा .
अब अपने ही श्रम का ,मोल नहीं हम पाते हैं,
हमें लूटते चंद लुटेरे ,बोल नहीं हम पाते हैं .
छिनी खुशियाँ,चली बंदूकें,चौराहा लहुलुहान हुआ ,
सत्ता के भ्रष्ट दलालों से,आजाद देश वीरान हुआ.
शनिवार, 4 फ़रवरी 2012
राह में यूँ काँटा बिछाया ना करो.
राह में यूँ काँटा बिछाया ना करो.
दूर रहकर मुझे सताया ना करो
हक़ है मुझे करीब रहने का,
महफ़िल में ऐसे पराया ना करो .
खता क्या है बताओ तो सही,
बेक़सूर हूँ फंसाया ना करो.
जिंदगी के लम्हे कीमती हैं बहुत,
दर्देगम में इसे जाया ना करो .
खुशियों को दामन में समेत लो सारे,
आंसुओं में इन्हें बहाया ना करो.
मंगलवार, 31 जनवरी 2012
तो मैं क्या करूँ ,
मुखौटे लगाकर लोग चलने लगे,तो मैं क्या करूँ ,
ख्यालात भी उनके बदलने लगे, तो मैं क्या करूँ.
इश्क की दुनिया रंज-ओ गम की तो न थी मगर,
अरमां दिलों के टूटने लगे, तो मैं क्या करूँ .
दौलत ने हर चीज खरीद डाली है दुनिया की ,
इंसानियत भी अब बिकने लगे, तो में क्या करूँ.
पैमाना दर्देगम का खाली हुआ मगर आजुर्दगी न गयी ,
छोड़कर मैखाने को वे जाने लगे,तो मैं क्या करूँ .
इरादतन तो 'अनुरागी ' ने उनको बुलाया ही न था ,
खुद पहलु में वे आने लगे तो मैं क्या करूँ .
मंगलवार, 17 जनवरी 2012
अंग-अंग में आग लगी है
मृदुभावों की सरिता में
विकल मन होता प्रभावित-
मधुमास की मादकता मे
मेरा अंतर्मन मर्माहित-
देख भवरों के मधुपान से
ह्रदय में अब प्यास जगी है
अंग-अंग में आग लगी है-
तेरे अन्तर्मन की थाह मिले कैसे
सागर की गहराइयों से
अनमोल रतन हैं उर में तेरे
स्नेहलता है ऊँचाइयों में
प्रियतम! तुम कितने निष्ठुर हो \
विरह वेदना खूब जगी है-
अंग-अंग में आग लगी है-
प्रियतम जब से मैंने तुझको
निश्छल मन में संजोया है]
मन मयूर नृत्य करे निसदिन
शापित यौवन अलसाया है-
सावन संध्या की निर्जन वेला में
चपल चांदनी बनी सगी है -
अंग-अंग में आग लगी है-
नववर्ष तेरा अभिनन्दन-अभिनन्दन.
नित नूतन सुख की किरणों से
मह्के जग ,सारा जीवन.
सुख-समृद्धि की पावन वेला में
छूटे कष्टों के बंधन .
जीवन के क्षण-क्षण में,
हो,उर में नेह स्पंदन .
नववर्ष तेरा अभिनन्दन-अभिनन्दन.
अशिक्षा का मिटे अँधेरा
खुशियाँ छाये आंगन-आंगन
नयनों से नित नेह बरसे,
मिटे शोषितों के क्रन्दन.
हिंसा की ज्वाला बुझे
जग में फैले अपनापन.
नववर्ष तेरा अभिनन्दन-अभिनन्दन.
आशाओं का हो सवेरा
शुभ संदेशों का नित आगमन.
पर्यावरण की रक्षा को ,
फैले जग में वन उपवन .
युग युग के सेतु नववर्ष
सदभावों से तुझे नमन .
नववर्ष तेरा अभिनन्दन-अभिनन्दन.
ओ मानव-क्रांति के अग्रदूतों
तुम कुछ ऐसा करो गर्जन .
मातृभूमि के शत्रुओं का ,
हो जिससे मान-मर्दन .
स्मरण रहे सदा हमें,
अपना गौरवमय इतिहास पुरातन .
नववर्ष तेरा अभिनन्दन-अभिनन्दन.
कुण्डलियाँ
प्रजातंत्र के युग में ,आ गयी है मौज,
भ्रष्टाचार दलाली में,लगी लुटेरों की फ़ौज.
लगी लुटेरों की फ़ौज,लोकतंत्र हुआ बदनाम,
महंगाई के बोझ से, बढ़े राशन के दाम ,
देख कवि 'अनुरागी',सत्ता का अद्भुत मंत्र,
नेता अफसर मौज में,बीमार हुआ प्रजातंत्र,
भारत के लोकतंत्र में ,भ्रष्टाचारी हैं मालामाल,
घोटालों के इस दौर में, जनता है बेहाल.
जनता है बेहाल, ऐसा क्यूँ सोचा भाई ,
हमें सुला फुटपाथ पर, खुद चाट रहे मलाई .
सोचे कवि 'अनुरागी', कैसे हैं ये गोरख धंधे,
पब्लिक चिल्लाये सड़कों पर,नेता हो गए अंधे,
राजनीति के घाट पर,लगी सरकार को ठंड,
सुप्रीम कोर्ट ने है दिया , टूजी घोटाले का दंड .
टूजी घोटाले का दंड , चिदंबरम भी थर्राये,
कपिल, सोनिया, दिग्विजय ,अब कैसे गुर्राएँ.
कहे कवि 'अनुरागी, मत पनपाओ दरिद्रता,
देशहित की बातें सोचो,लोकतंत्र में लाओ भद्रता .
भ्रष्टाचार दलाली में,लगी लुटेरों की फ़ौज.
लगी लुटेरों की फ़ौज,लोकतंत्र हुआ बदनाम,
महंगाई के बोझ से, बढ़े राशन के दाम ,
देख कवि 'अनुरागी',सत्ता का अद्भुत मंत्र,
नेता अफसर मौज में,बीमार हुआ प्रजातंत्र,
भारत के लोकतंत्र में ,भ्रष्टाचारी हैं मालामाल,
घोटालों के इस दौर में, जनता है बेहाल.
जनता है बेहाल, ऐसा क्यूँ सोचा भाई ,
हमें सुला फुटपाथ पर, खुद चाट रहे मलाई .
सोचे कवि 'अनुरागी', कैसे हैं ये गोरख धंधे,
पब्लिक चिल्लाये सड़कों पर,नेता हो गए अंधे,
राजनीति के घाट पर,लगी सरकार को ठंड,
सुप्रीम कोर्ट ने है दिया , टूजी घोटाले का दंड .
टूजी घोटाले का दंड , चिदंबरम भी थर्राये,
कपिल, सोनिया, दिग्विजय ,अब कैसे गुर्राएँ.
कहे कवि 'अनुरागी, मत पनपाओ दरिद्रता,
देशहित की बातें सोचो,लोकतंत्र में लाओ भद्रता .
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