संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

विचार लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
विचार लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 14 सितंबर 2014

हिंदी दिवस की यह कैसी औपचारिकता


समझ में नहीं आता कि हिंदी दिवस हिंदी भाषी राज्यों में मनाने की जरुरत क्यों पड़ गयी है ? इसलिए कि हिंदी अब हिंदी भाषी क्षेत्रों में इतनी बेगानी हो गयी है उसे अपनी याद दिलाने के लिए ऐसा दिन चुनना पड़ रहा है जैसे हम लोग साल भर में एक दिन अपना जन्मदिन मनाते हैं . क्या कहीं दुनिया में इंग्लिश डे,रूसी दिवस,चीनी दिवस भी मनाया जाता है? अगर एक दिन हिंदी के लिए है तो बाकि दिन किसके लिए? ये भी तो साफ़ होना चाहिए.
 हिंदी भाषी क्षेत्रों में जब ये हाल हिंदी का हो रहा है तो गैर हिंदी भाषी क्षेत्रों में हिंदी की स्थिति का आप सहज ही अनुमान लगा सकते हैं. पिछले वर्ष  प्रधानमंत्री मोदी ने पीएम कार्यालय से पत्र व्यवहार हिंदी भाषा में ही करने के लिए सभी राज्यों को पत्र लिखा था. आजादी के ६५ साल बाद हिंदी राष्ट्रभाषा होने के बावजूद भी गैर हिंदी राज्यों ने पीएम कार्यालय के इस पत्र पर हंगामा खडा कर दिया था. सभी सेकुलर मानसिकता वाली जमात औए सेकुलर मिडिया इसके विरोध में खड़ी हो गयी. आप समझ सकते हैं कि हिन्दुस्तान में हिंदी की स्थिति अभी सम्मानजनक नहीं है. हिंदी दिवस मनाना केवल एक औपचारिक कार्यक्रम बन कर रह गया है. हिंदी को हम आप ही मिलकर आगे बढ़ा सकते हैं अपने जीवन में हिंदी को पूर्णतया आत्मसात करके.


रविवार, 31 मार्च 2013


भारतीय राजनीति का अजब खेल ..निजी बयानबाजी या राजनीतिक साजिश
 भारतीय राजनीति का जब कोई खिलाड़ी सार्वजनिक रूप से अपना मुंह खोलता है तो उसे पता नहीं होता है कि वह कर क्या रहा है और बोल क्या रहा है. टीवी पर अनर्गल बयानबाजी कुछ नेताओं की आदत बन गयी है.
आजकल कुछ ऐसे ही नेता इस बीमारी से बुरी तरह पीड़ित हैं. सवाल ये है कि जब कोई नेता या किसी राजनितिक दल का प्रवक्ता सार्वजनिक रूप से कोई विवादित बयान देता है तो यह बयान किसी भी रूप से उसका निजी कैसे हो सकता है ? अगर वह किसी पार्टी में या सरकार में किसी पद पर है तो यह और भी गंभीर बात है . सार्वजनिक जीवन से जुड़े व्यक्ति के बयान को निजी बताना  बेवकूफी नहीं तो और क्या कह सकते है. 
पहली बात तो ये है कि राजनीति में प्रवेश करना ही सार्वजनिक जीवन में प्रवेश करना होता है. उसकी हर जन प्रतिनिधियों के सार्वजनिक कृत्य पर जनता की नजर होनी ही चाहिए.जनता को उसके बार में जानने का नैतिक अधिकार भी है. इस बात पर सवाल उठाना लोकतंत्र की अवधारणा को कमजोर करना है. जिन नेताओं को निजि जीवन में किसी की दखलंदाजी पसंद नहीं वे सार्वजनिक जीवन से खुद को हटा सकते हैं. अगर किसी को अपना निजी जीवन ज्यादा महत्वपूर्ण लगता है तो उसे सार्वजनिक जीवन में नहीं  बने रहना चाहिए। राजनीतिज्ञों के लिए सार्वजानिक जीवन में बने रहना कोई संवैधानिक मजबूरी नहीं है.
निजी बयान को किसी ने  अभी तक परिभाषित नहीं किया है. जब किसी की कोई बात सार्वजनिक हो जाती है तो वह किसी का निजी कैसे हो सकता है. अगर किसी को अपनी निजी बात किसी से कहना है तो उसे व्यक्तिगत रूप से किसी को अपने घर में बुलाकर कह सकता है. टीवी चेनल ,मिडिया को प्रेस वार्ता चलाकर अपनी बात कहना निजी नहीं हो सकता है. इसे निजी भी तभी माना जा सकता है जब वह मिडिया को पहले ही बता दे कि कहे कि उसकी वार्ता एकदम निजी है इसे टीवी ,अखबारों में कदापि ना दिखाएँ. लेकिन होता इसका उल्टा है .पहले वार्ता जोर-शोर से मोडिया में उछाला जाता है. फिर उसकी प्रतिक्रिया देखी जाती है. अगर जनता में सन्देश नकारात्मक चला गया या बयान विवादित हो गया तो पार्टी या सरकार उस बयान से अपना पला झाड़ कर उसे निजी बयान बताकर मांमले को दबाने की कोशिस करने लगती है .
राजनीतिज्ञों को सार्वजनिक रूप से बयान देने से स्वयं सचेत रहना चाहिए. लेकिन अब ऐसा बहुत कम हो रहा है. ये राजनितिक मूल्यों का अवमूल्यन होने का उदाहरण है. भारतीय राजनीति अब हर क्षेत्र में विवादित रूप ले रही है. जनता का विश्वास राजनीतिज्ञों से लगातार उठाता जा रहा है. अगर यही हाल रहा तो लोकतंत्र की मूल अवधारणा ना केवल पूरी तरह समाप्त हो जायेगी बल्कि यह कुछ लोगों की बंधक भी बन कर रह जायेगी. 
मिडिया को भी चाहिए कि  वह ऐसे विवादित बयानों को ज्यादा महत्व ना दे. इससे न केवल लोकतंत्र को नुकसान पहुंचता है बल्कि जनता के धन व समय की भी बर्बादी होती है.    





बुधवार, 12 सितंबर 2012

‘इंडियन’ या ‘इडियट’



ब्रिटेन से बाहर निकलकर अंग्रेज जहां जहां भी साम्राज्य के विस्तारीकरण के लिए गए. वहां उन्होंने खुद को न केवल सभ्य बताया बल्कि साथ ही स्थानीय लोगों को अपनी आदत के अनुसार हमेशा असभ्य,मूर्ख ही घोषित किया. यही नहीं उनके साथ अछूतों जैसा व्यवहार भी किया. स्थानीय निवासियों को ‘इडियट’ कहकर अपमानित करते हुए अंग्रेजों ने बाद में उन्हें अपने दस्तावेजों में इस शब्द में मामूली परिवर्तन कर वहां के आदिवासियों के लिए ‘इंडियन’ भी लिखना शुरू कर दिया. 
 अमेरिका के काले मूल आदिवासी नागरिक जिन्हें ‘हब्सी’ भी कहा जाता है. विश्व भर में अंग्रेजों द्वारा प्रचलित तथाकथित नवीन सभ्यता में उन्हें ‘सेमीनोले इंडियन’ के नाम जाना जाता है. उन्हें न केवल ह्येय दृष्टि से देखा गया अपितु उन पर अंग्रेजों द्वारा अत्याचार भी बहुत किये गए. सभ्यता के प्रतीक  कहे जाने वाले अमेरिका में मानवाधिकारों से भी उन्हें कई दशकों तक वंचित भी रखा गया. 
इसी तरह उत्तरी अमेरिका में भी तथाकथित असभ्य अन्य मूल आदिवासियों को ‘रेड इंडियन’, अफ्रीका में मूल आदिवासियों को ‘ब्लेक इंडियन’ कहा. जब अंग्रेजों ने भारत का रुख किया तो उन्हें यहाँ के लोग भी ‘इडियट’ ही नजर आये. ब्रिटिश शासन काल में अंग्रेजों ने यहाँ की जनता को अपनी ह्येय मानने की दृष्टि के मानसिकता के कारण देश के कई स्थानों पर “डॉग एंड इंडियन नॉट अलाउड” के बोर्ड लगा दिए थे. क्योंकि अंग्रेज मानते थे कि पश्चिमी सभ्यता के मुकाबले ये भारतीय अत्यधिक असभ्य,अशिक्षित और बुद्धिहीन हैं. इसीलिये अंग्रेजों ने भारतीयों के लिए भी अमेरिका,अफ्रिका के मूल आदिवासियों की तरह यहाँ के निवासियों को भी ‘इडियट’ या ‘इंडियन’ ही कहना शुरू कर दिया. ‘इंडियन’ शब्द का मूल ‘इडियट’ ही है. साफ़ जाहिर है  ‘इंडियन’ से ही ‘इंडिया’ की उत्पत्ति हुई ना कि ‘इंडिया’ में रहने वालों के कारण ‘इंडियन’ शब्द की. सवाल ये है कि अगर भारतीय ही इंडियन हैं तो फिर अमेरिका,अफ्रिका के मूल निवासियों को ‘सेमीनोले इंडियन’,‘रेड इंडियन’, ‘ब्लेक इंडियन’ क्यों कहा गया? सवाल ये भी है कि ये 'इंडियन' शब्द अंग्रेजों ने हर जगह किस उद्देश्य से प्रयोग किया ? 


बड़े दुःख के साथ कहना पड़ रहा है कि आज भी हम अंग्रेजों द्वारा दी गयी सिर्फ सत्ता हस्तांतरण की राजनीतिक आजादी के बाद भी मानसिक,बौद्धिक रूप से पश्चिमी सभ्यता के अनुकरण में बुरी तरह जकड़े हुए हैं. हम आज भी अपमान का प्रतीक ‘इंडियन’ शब्द को तिलांजलि देने के बदले उसपर गर्व करते नहीं थक रहे हैं.