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मंगलवार, 22 मार्च 2016

होली की कुंडलियाँ

 राजनीति चौपड़ बिछी ,मन मलीनों के बीच,
  सत्ता  के  हुडदंग   में,  फेंके  स्वारथ  कीच,
  फेंके  स्वारथ  कीच, कर  जीवन  सुखदाय,
  सौ  सौ  जुटे  खायके ,इज्जत  लई  बचाय,
  कहे  कवि 'अनुरागी,'दुनिया  उसने जीती ,
  हर काले धंधे  के  साथ, करता जो राजनीति .

                             
कवि सम्मलेन के मंच पर,आओ खेलें होली,
छंद करे स्वच्छंद, फाड़ कविता की चोली.
फाड़ कविता की चोली, काटें शब्दों के पेड़,
कविता बांचें हास्य की,मार श्रोता की रेड़.
मांगत कवि ‘अनुरागी’,दो ‘हास्यरत्न’ पुरस्कार,
एक अकेला हास्य कवि, बाकी सब मक्कार.
                           

शनिवार, 10 नवंबर 2012

कुंडलियाँ

प्रजातंत्र के इस दौर में,आ गयी है मौज.
भ्रष्टाचार,दलाली में, लगी लुटेरों की फ़ौज,
लगी लुटेरों की फ़ौज,देश हो रहा बदनाम.
मंहगाई के बोझ से, जीना हुआ हराम.
देखत कवि ‘अनुरागी’,सत्ता का ये मंत्र.
नेता दलाल मौज में,बंधक बना प्रजातंत्र.

भारत के लोकतंत्र में,जनता हुई हलाल,
होते रोज घोटालों से,लुटता देश का माल.
लुटता देश का माल,अब क्या होगा भाई,
देश डूबे घोटालों में,नेता चाट रहे मलाई.
रोवत कवि ‘अनुरागी’,देख सत्ता के धंधे,
पब्लिक चिल्लाये सड़कों पे,नेता हो गए अंधे.

राजनीति के घाट पर,लगी लोकतंत्र को ठण्ड,
नित नए घोटालों से ,मिला जनता को दंड.
मिला जनता को दंड, डायन मंहगाई खा गयी,
सत्ता के दलालों को,घोटालों की दुनिया भा गयी.
दुखी कवि ‘अनुरागी’, अब कौन सुने आपबीती,
नैतिकता,सदाचार को, खा गयी पूरी राजनीति.

बुधवार, 8 फ़रवरी 2012

कुण्डलियाँ

         

                              लाठी  मेरी  देखा  कर ,भैंस  रह गयी  दंग,
                     शक्तिवान  सावंत  तुम,चल  रही हूँ  संग.
                     चल  रही हूँ संग,लाठी की  ताकत   न्यारी.
                     सबल के बल पौरुष से ,निर्बल चली बेचारी.
                     कह कवि 'अनुरागी',जग की यही परिपाटी ,
                     होगी भैंस उसी  की ,हाथ में  जिसके  लाठी .



                मक्खन में गुण बहुत हैं ,सभी जानते आज.
                सभी जगह पूजते फिरें, जो हैं  मक्खनबाज .
                जो  हैं  मक्खनबाज,उन्हीं  का आज ज़माना  ,
                वही   मजे   में, जो   मक्खन   का   दीवाना .
              कहे  कवि ' अनुरागी' आप  भी  मक्खन  लीजे ,
             सफल जीवन के लिये,मक्खन की मालिश कीजे.



           कवि  सम्मलेन  के  मंच  पर ,आओ  खेलें  होली .
           छंद   करें  स्वच्छंद , फाड़  कविता  की  चोली.
           फाड़   कविता  की  चोली, घिसें  शब्दों  के  पेड़ ,
           कविता  बांचे  हास्य  की , मार  श्रोता  की  रेड़.
            कहे  कवि 'अनुरागी', मिले  जीवन  का  मृदुफल तभी ,
           साहित्य जगत के उपवन में,जब कहलाये वह हास्यकवि 

मंगलवार, 17 जनवरी 2012

कुण्डलियाँ

                 प्रजातंत्र   के   युग  में ,आ  गयी   है मौज,
           भ्रष्टाचार दलाली में,लगी लुटेरों की फ़ौज. 
          लगी लुटेरों की फ़ौज,लोकतंत्र हुआ बदनाम,
          महंगाई   के  बोझ  से, बढ़े  राशन  के  दाम ,
          देख कवि 'अनुरागी',सत्ता  का अद्भुत मंत्र,
          नेता अफसर मौज में,बीमार हुआ  प्रजातंत्र,


          भारत के लोकतंत्र में ,भ्रष्टाचारी हैं मालामाल,
          घोटालों   के   इस   दौर  में, जनता  है  बेहाल.
          जनता   है  बेहाल,  ऐसा   क्यूँ   सोचा   भाई ,
          हमें सुला फुटपाथ पर, खुद चाट  रहे  मलाई .
         सोचे  कवि 'अनुरागी', कैसे  हैं ये  गोरख धंधे,
         पब्लिक चिल्लाये सड़कों पर,नेता हो  गए अंधे,  


        


       राजनीति   के घाट  पर,लगी  सरकार  को  ठंड,
        सुप्रीम कोर्ट  ने  है दिया , टूजी  घोटाले का  दंड .
        टूजी घोटाले   का  दंड ,  चिदंबरम  भी   थर्राये,
       कपिल, सोनिया, दिग्विजय ,अब  कैसे  गुर्राएँ.
       कहे  कवि  'अनुरागी, मत  पनपाओ   दरिद्रता,
      देशहित की बातें सोचो,लोकतंत्र में लाओ भद्रता .